Sunday, May 16, 2021

गुनाह

क्या ख़्वाबों का रंगीन होना गुनाह है 

या इंसानों का जहीन होना गुनाह है

कायरता समझते है लोग मधुरता को

क्या जुबान का शालीन होना गुनाह है 

खुद का नजर लग जाती है

क्या हसरतों का हसीन होना गुनाह है 

लोग इस्तेमाल करते है नमक की तरह

क्या आसुओं का नमकीन होना गुनाह है

दुस्मनी हो जाती है सैकड़ों से

क्या इंसान का बेहतरीन होना गुनाह है

लोग जल जाते है निहार कर जोड़ें को

क्या उनका संगीन होना गुनाह है

                             Sunil Gavaskar

                         

20 comments:

  1. Nice poetry well written superb

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  2. __तारीफ_ए_क़ाबिल

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  3. Awesome feeling said with words ....😍💞

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  4. Kya likha hai wah wah

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  5. Niche se 5th line me gunah missing hai ..btw nice thought..

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  6. बहुत ही प्यारा लिखा है.. बस शब्द की एक दो जगह त्रुटियां हैं.. बाकि कविता एकदम झकास है..👌👌👌लिखते रहिए।👍

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