Monday, August 23, 2021

किसी रोज जताएंगे

दर्द क्या होता है जतायेंगे किसी रोज़ 
कमाल की ग़ज़ल है सुनाएंगे किसी रोज़

थी उन की जिद  है कि मैं जाऊँ उन को मनाने 
मुझ को यह वहम था वो बुलाएंगे किसी रोज़

कभी ऐसा होगा मैंने तो सोचा भी नहीं था 
वो इतना मेरे दिल को दुखाएंगे किसी रोज़

हर रोज़ शीशे से यही पूछता हूँ मैं 
क्या रुख पे तबस्सुम सजाएंगे किसी रोज़

अपने सितम को देख लेना खुद ही साक़ी तुम 
ज़ख्म-ऐ -जिगर तुमको दिखायेगें किसी रोज़

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